you walked away

You said you loved me

We couldn’t be friends anymore

You asked me if I loved you too

I had no answer then

Baby, you loved control

You wanted it all your way

Needed my answer right away

But true that I got scared

And you walked away

Thought of losing you, made me total blank

I had died every day

And baby I got all insane

My heart was on high flame

It burned every single fear

Which my heart ever had

My heart was ready

To beat for you my lady

Now I had no fear.

Passed a few weeks

And killed all my freaks

I called you right away

You picked up at the end

I asked you to meet

You said why not, ping me street

Having my heart in mouth

Beats were so loud

That anyone could heard

I saw you coming by

your hands with some other guy

Did I made it too late

Or you didn’t wait

All that i could do is just hate you

Hate that you lied to me

Or you had taken a chance with me

which I denied,

Now You are with another man

I had lied that time

Don’t know why

But I was not happy

Seeing you blushing and shy

You had taken no time

Walked away, first time

For never coming back

I really wish we could talk about it

But

We really don’t stand a chance

Not a bit

Now we have this bad blood

Earlier used to had our love flood

You wrecked my heart

You broke that part

Of US as Best Friends

I loved you a lot

You loved me too

Tell me what happened now

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जयपुर: हमारे बीच वो लोग आज भी जिंदा हैं ( भाग-4)

राजस्थान के जयपुर शहर में हमारी यात्रा का आखिरी दिन।
25 दिसंबर। क्रिसमस। बड़ा दिन।
आज क्रिसमस है और आज ही हमें इस शहर को अलविदा कहना है। अच्छा तो नहीं लग रहा पर क्या कर सकते है। यहां से निकलेंगे तभी तो कहीं और पहुचेंगे।
सो आज हमारा प्लान था सबसे पहले हवा महल जाने का, फिर जंतर मंतर, उसके बाद अलबर्ट हॉल और फिर इसारलेट टॉवर। ये सभी स्थल एक दूसरे के करीब करीब में ही स्थित हैं,पैदल एक से दूसरे तक पहुंचा जा सकता है। आखिर में हमें बापू मार्केट होते हुए जाना था जयपुर स्टेशन की तरफ।

हालांकि हमें होटल से निकलते वक़्त ही जानकारी मिल गई थी कि आज अलबर्ट हॉल बंद रहने वाले था क्योंकि अक्टूबर से लेकर मार्च महीने तक महीने का आखिरी मंगलवार रख रखाव के लिए निर्धारित है और आज महीने का वही आखिरी मंगलवार है।
चलिए संग्रहालय नहीं सही बाकी स्थलों को घूमने के उद्देश्य से हम सब सुबह ही निकल पड़े होटल से। हमारा पहला रास्ता सबसे पहले पहुंचा हवा महल की तरफ। आज हम एक बात को लेकर संतुष्ट थे कि हमें कहीं भी प्रवेश टिकट नहीं लेना था क्योंकि हमने कल ही कंपोजिट टिकट ले लिया था सो आज हमें बस गंतव्य तक पहुंचना था, मजे करना था। रास्ते में ट्रैफिक काफ़ी थी क्योंकि क्रिसमस से लेकर न्यूईयर तक छुट्टियां होने के वजह से यहां बहुत ज्यादा भीड़ बढ़ गई। ये तो हमने तभी अंदाजा लगा लिया था जब हम अपने होटल के डाइनिंग हॉल पहुंचे थे सुबह नाश्ते के लिए। मुश्किल से खाली टेबल दिखी था।
ख़ैर ट्रैफिक को चीरते हुए हम पहुंच चुके थे हवा महल के सामने। हवा महल,सिटी पैलेस के बिल्कुल पास में ही है। आपको बता दूं की हवा महल में सामने की तरफ कोई प्रवेश द्वार नही है। अगर आपको अंदर जाना है तो आपको पिछले भाग से जाना होंगा। मतलब ये कि महल का पिछला भाग दरअसल महल का अगला भाग है और सड़क की तरफ से सामने दिखने वाला भाग इसका पिछला भाग है। आज सामने से इसे( महल का पिछला भाग) देखते हुए एक बार फिर वही खयाल आया की इसकी खूबसूरती पर कितनी धूल जमा है ( बाहरी दीवारों पर)। इस ऐतिहासिक और बेहतरीन महल के ऊपर इतनी धूल, जिसे देखने ना केवल अपने देश के लोग बल्कि अन्य देश के लोग भी हजारों की संख्या में रोज आते हैं। थोड़ी सफाई की हक़दार तो है ये महल भी। चलिए सफाई तो जब होगी तब होगी,अभी चलते है हवा महल के थोड़ा और करीब। यह महल भी जयपुर की अन्य ऐतिहासिक इमारतों की तरह ही लाल गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी हुई है। रोचक बात ये है कि यह महल बिना किसी आधार का बनाया गया है और 87° पर झुका हुआ है। पर अपने पिरामिड कि तरह आकर होने के कारण यह आज भी बेपरवाह होकर खड़ा है। राजपूत राजा सवाई प्रताप सिंह, जो कि भगवान श्री कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे,उन्होंने इसे भगवान के मुकुट के आकार में ही 1799 ई में बनवाया। इसे मूर्त रूप दिया स्थापत्य कलाकार लाल चंद उस्ताद जी ने। इसकी वास्तुकला भी मुग़ल और राजपूत शैली की मिश्रण है। यह महल एक 5 मंजिली इमारत है और बाहरी बनावट बिल्कुल ऐसी है कि देखने पर इसपर नक्काशीदार मधुमक्खी के अनेक छत्ते सी दिखती है। इस महल का नाम हवामहल रखा गया, नाम से ही मालूम पड़ता है कि इस महल का हवा से जरूर कुछ लेना देना है। हां तो बिल्कुल है, क्योंकि इस महल में कुल 953 छोटी खिड़कियां या झरोखे बनाए गए हैं जिसकी वजह से इस महल की आबोहवा हमेशा ही ताज़ी बनी रहती है। जयपुर जैसे शहर में जहां इतनी गर्मी पड़ती है वहां जब आप इस महल के भीतर होते हैं तो उस गर्मी का एहसास तक आपको छू नहीं सकता। क्योंकि हवा और प्रकाश को महल के भीतर आने की पूरी पूरी छूट मिली हुई है। इसी वजह से यह महल गर्मी के मौसम में शाही परिवार का गृष्मावास हुआ करता था। इतिहास की बात हो ही रही है तो ये जानना तो बहुत जरूरी है कि महल की खिड़कियों का काम केवल हवा और प्रकाश को भीतर लाना नहीं था बल्कि शाही महिलाओ को बाज़ार और महल के बाहर हो रहे उत्सवों को दिखाना भी था। शाही महिलाएं इन्हीं खिड़कियों पर खड़ी होकर बाहर का नज़ारा देखती थी और पर्दा प्रथा के नियमों के अनुसार बाहरी लोगो की नज़रों में भी नहीं आती थी।
अब हम हवा महल के अंदर आ चुके थे। यह महल बाहर से जितना ही भव्य और वास्तुकला से अलंकृत दिखता है, भीतर से उतना ही सामान्य सा है। बिल्कुल किसी निजी आवास की तरह। भव्य द्वार से प्रवेश करते ही हमें सामने एक बड़ा प्रांगण या आंगन दिखा और इसके तीन तरफ दो मंजिली इमारत। यहां एक खूबसूरत पानी का फब्बारा है। जो इस साधारण से आंगन को असाधारण बना देता है। महल के ऊपरी मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां नहीं है बल्कि संकरे स्लोपि रास्ते हैं। ऊपर के हॉल में खिड़कियों पर रंगीन शीशे लगे हुए हैं जिनसे होकर आने वाली सूर्य की रोशनी हॉल में अद्भुद छटा बिखेरती है। इस महल के ऊपरी छत से जब हम आसपास नजरे दौड़ा रहे थे हमे हवा महल के पीछे ही जंतर मंतर और उससे थोड़ा और पीछे की तरफ इसर्लेट दिखा और थोड़ा सा धुंधलाता हुआ पहाड़ी के ऊपर किला भी दिखा। ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए जहां काफी संकरे स्लोप हैं तो ऊपर पहुंचने के बाद वहां रुकने के लिए भी काफी कम जगह ही है। इसी वजह से गार्ड एक बार में केवल दस से बारह लोगो को ऊपर जाने दे रहे थे वो भी ऊपर से लोगो के नीचे आ जाने के बाद और वहां व्यतीत करने के लिए समय भी कम दिया जा रहा था। भीड़ बहुत ज्यादा थी और सभी को वहां व्यतीत करने के हेतु बराबर समय देने के लिए इस तरह की व्यवस्था जरूरी भी थी । महल के नीचे की मंजिल पर आने के बाद हम गए यहां बने एक पुरातात्विक संग्रहालय में। जिसमे कुछ पुरातात्विक स्तंभ के भाग और ढेरों पुराने वाद्य यंत्र है,उनकी पूर्ण जानकारी है, जो आज चलन में भी नहीं हैं। जब हम सवाई प्रताप सिंह के निजी कक्ष में पहुंचे तो वहां हमने महाराज प्रताप सिंह की एक खड़े मुद्रा में मूर्ति देखी जिनके एक हाथ में रुद्राक्ष सी दिखने वाली माला और दूसरे हाथ में पंक्षी पंख से बनी कलम है। कहा जाता है इस कक्ष में महाराज भगवान श्री कृष्ण की वंदना किया करते थे,उनके लिए भक्तिरस की कविताएं लिखा करते थे, इसी वजह से इसका नाम प्रताप मंदिर पड़ गया। इस कक्ष के बाहर बना बरामदा शुभम भवन्तु नाम से जाना जाता है जिसे फूलों और लताओं से सजाकर कृष्ण भक्ति के लिए सुगंधित मनोरम वातावरण बनाया जाता था। हवा महल के बारे में स्वयं महाराज ने डिंगल भाषा में लिखा था –
हवा महल थाटे कियों, सब समझो यह भाव।
राधा कृष्ण सिधारसी, दरस परस का भाव।।
इस प्रताप मंदिर प्रांगण में आकर हम सब भी भक्तिमय हो गए थे। एक प्रकार की पॉजिटिव एनर्जी है इस भवन में।
जब हम महल में आए थे उस वक़्त फब्बारे बंद थे पर अब संचालकों ने उसे चालू कर दिया था। इस फब्बारे की एक सीधी धार भी महल की लाल गुलाबी दीवार और आसमान के नीले रंग में एक सफेद सी रेखा खींच रही थी जिसे देख कर लगता था जैसे ये उस आसमान को भेद कर उसके पार चली जाएगी।
महल से बाहर आते हुए हम एक अजीब से भाव से ग्रस्त हो चुके थे। हम इस महल को अब केवल एक इमारत की तरह नहीं बल्कि मंदिर की तरह देख पा रहे थे,जहां जाकर सारी भौतिकता खत्म हो जाती है वैसे ही जैसे महाराज सवाई प्रताप सिंह बाहर से भले ही एक राजा थे पर भीतर से भगवान श्री कृष्ण के एक अनन्य भक्त थे ठीक वैसे ही यह महल भी बाहर से बिल्कुल शाही और विशेष प्रकार से अलंकृत है पर भीतर से उतना ही साधारण और सामान्य है। हमारी आंखों को जितनी इसकी भव्यता रास आयी थी उतनी ही इसकी शालीनता हमारे मन में बस गई थी।
महल को मन में बसा कर और भीड़ को चीरते हुए हम सब भी बाहर आ गए। दोपहर हो चुकी थी और भूख भी लग चुकी थी सो हमने सबसे पहले पास से ही कुछ बिस्कुट और नमकीन लिए और खाते हुए निकल पड़े जंतर मंतर की तरफ। यहां आते हुए पहले ही हमने विचार कर लिया था कि किसी भी यंत्र पर हम ज्यादा समय नहीं दे पाएंगे। धूप कुछ ज्यादा ही तेज थी इस वक़्त। इस विचार के साथ हमने जंतर मंतर परिसर में प्रवेश किया।

जारी है………..

हमारे बीच वो लोग अभी जिंदा है : जयपुर ( भाग -3)

तीसरा दिन

आज हमें जाना था जयगढ़ किला, आमेर किला, और जल महल। ये किले एक ही मार्ग में स्थित हैं। हालांकि नाहरगढ किला भी इसी मार्ग पर है पर हमारी गलती और ऑटो अंकल की स्वार्थी बुद्धिमत्ता की वजह से हम वो पहले दिन ही देख चुके थे। दूसरे दिन भी हम ट्रैवल एजेंट की गैर जिम्मेदराना रवैये की वजह से इन जगहों को नहीं देख पाए थे। सो आज का हमारा दिन था इन किलो के नाम।
गाड़ियों के साथ हमारे छत्तीस के आंकड़े को देखते हुए कल ही हमने एक ऑटो वाले भाई से बात कर ली थी। हमारा आज का दिन शायद अच्छा जाने वाला था। आज सुबह से सब कुछ पॉजिटिव जा रहा था। इसी क्रम में हमारे ऑटो वाले भाई भी दिए हुए समय से पहले ही हमारे होटल के सामने आ पहुंचे थे। इसलिए तनिक भी देर ना करते हुए हम सब ऑटो में सवार होकर निकल पड़े आमेर की तरफ। आमेर राजधानी जयपुर से 11 कि.मी. उत्तर में स्थित एक कस्बा है जिसका विस्तार 4 वर्ग किलोमीटर है। जयगढ़ किला और आमेर किला दोनों ही अरावली पर्वतमाला में चील का टीला नामक पहाड़ी पर स्थित हैं।
रास्ता पहाड़ी था। एक तरफ सुखी बंजर सी दिखने वाली ऊंची टिलाएं तो दूसरी तरफ वैसी ही सुखी खाई। इसे देख कर इसके वीरान और अकेले होने का दुखद एहसास होता था। सैकड़ों गाड़ियां थी इन रास्तों पर, पर ये रास्ते फिर भी अकेले से थे। पतली सड़क होने की वजह से गाड़ियां एक दूसरे के पीछे कतारबद्ध होती हुई,तो कभी कभी बगल से रास्ता बनाती हुई निकल रही थी। यहां राजस्थान की गाड़ियों से कहीं ज्यादा दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड की गाड़ियां दिख रही थी, और आश्चर्य तो तब हो रहा था जब उनके बीच पश्चिम बंगाल, असम, सिक्किम, कर्नाटक की भी गाड़ियां गुजर रही थी। भारत के पूर्वी और दक्षिणी कोनों से भी लोग देश के राजपूताना और मुग़ल इतिहास के साक्षी बनने आए थे। निःसंदेह साल का यह समय (दिसंबर,जनवरी, फरवरी) राजस्थान पर्यटन का सबसे व्यस्त समय होता है।
इन पहाड़ी रास्ते में जाते हुए आपको तरह तरह की पंक्षियां दिख जाएंगी। हालांकि ऑटो में बैठने का सबसे नकारात्मक पक्ष ये है कि इसकी सीट ऊंची होने और साइड रूफ नीचे की तरफ मुड़ी होने की वजह से आप बाहर आसानी से नहीं देख सकते। फिर भी हम सिर झुका कर बाहर देखते रहे क्योंकि एक बार शहर की भीड़ में वापस आने के बाद हम प्रकृति का ये असली स्वरूप नहीं देख पाएंगे। इन पहाड़ों को, इन पेड़ों को, इन पंक्षियों को, प्रकृति ने ही बनाया है,उसने ही उकेरा है। कुछ भी कृत्रिम नहीं था यहां। इस तरह हम प्रकृति के सामने नतमस्तक होकर उसे सम्मान दे रहे थे, इन सभी चीजों के लिए अपना आभार प्रकट कर रहे थे। इस कृतज्ञता भरी भावनाओं से ओतप्रोत हम कब जयगढ़ किले तक पहुंच गए पता भी नहीं चला।
अच्छी बात ये थी कि हमने कल ही 300/ व्यक्ति के हिसाब से अपने लिए कंपोजिट टिकट ले लिया था। जिसके अन्तर्गत जयपुर के अन्य मुख्य पर्यटन स्थलों के साथ साथ ये दोनों किले भी सम्मिलित थे। सो हमें टिकट सम्बंधित कोई दिक्कत नहीं हुई। हमे वहां टिकट के लिए नहीं रुकना पड़ा था। यहां आकर हमें पता चला कि 100 रुपए की ग्रांट टिकट लेकर हम अपनी गाड़ी को अंदर तक ले जा सकते थे। पर हमने ऐसा नहीं किया था। हम पैदल ही चल पड़े थे। यहां बच्चो की 2-3 कतारें देख कर लग रहा था किसी स्कूल का टूर भी था आज। जो कभी बिल्कुल शांत सुशील आज्ञाकारी बच्चे थे तो कभी किले को कंपा देने लायक शोर करते हुए साक्षात शैतान के रूप थे।
खैर इन किलों को देखकर एक बात तो हमेशा ही मन में आती है की उस समय जब कोई उपकरण नहीं थे,जब कोई सीमेंट,गिट्टी और सरिया नहीं प्रयोग होता था तब के बने हुए ये किले आज हज़ारों सालों बाद भी कैसे बेख़ौफ़ खड़े हैं जबकि आज के उन्नत तकनीक द्वारा बनायी जाने वाली घर,सड़क,इमारतें कैसे कुछ वर्षों में ही धराशाई हो जाती है। ये सोचते हुए और विमर्श करते हुए ही हम अब प्रवेश कर चुके थे जयगढ़ किला परिसर के भीतर। बताती चलूं इस दुर्ग का निर्माण जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में आमेर दुर्ग एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। इस किले को विजय किला भी कहा जाता है।आमेर पैलेस से लेकर जयगढ़ किले तक लगभग 4 किलोमीटर की खुफिया सुरंग है,जिससे किसी भी युद्ध जैसी आपातकालीन घटना के दौरान राजपरिवार को सुरक्षित आमेर पैलेस से निकाल कर इस फौलादी किले या यूं कहिए सैन्य बंकर तक लाया जा सके। अगर आप देखेंगे तो समझ जाएंगे कि इसे आमेर किले के आकार का ही बनाया गया है। हूबहू आमेर पैलेस फर्क बस इतना है कि आमेर पैलेस राज परिवार का निवास स्थान था तो जयगढ़ किला सेना का बंकर। जहां से सैनिक दिन रात आमेर पैलेस की निगरानी करते थे। इस किले के दो प्रवेश द्वार है जिन्हें दंगुर दरवाजा और अवानी दरवाजा कहा जाता है जो क्रमशः दक्षिण और पूर्व दिशाओ पर बने हुए है। इस किले की बाहरी दीवारें लाल बलुआ पत्थरों से बनी हैं और दीवारों पर राजपूती और मुग़ल कालीन शिल्प और वास्तुकला के मिश्रित बेहतरीन नमूने है।
किले के प्रत्येक कोने में ढलानदार प्राचीरें हैं जो ऊपरी संरचनाओं तक पहुंच प्रदान करती हैं। किले में जालीदार खिड़कियों वाली कोर्ट रूम और हॉल भी हैं। यहां हमने रानियों और राजाओं का आमने सामने बना भोजनालय देखा और उनके विश्राम गृह भी देखे। कभी कभी राज परिवार इस किले में भी अपना समय बिताया करता था। एक उभरे हुए मैदान पर एक केंद्रीय वॉच टॉवर भी है जो आसपास के परिदृश्य का 360 व्यू प्रदान करता है। परिसर के उत्तरी किनारे पर अराम मंदिर है। यहां एक चारबाग़ उद्यान है। इसे देखते ही आप समझ जाएंगे कि इसकी बनावट मुगलिया शैली में है। ये आज भी उतना ही खूबसूरत दिखता है जैसा कि वो पहले कभी होगा। हालांकि इसमें प्रवेश वर्जित है पर आप किले कि प्राचीर से इसे देख सकते है। मै सशर्त कह सकती हूं कि ये बाग देखने के बाद आपको एक बार उसमे उतर कर टहलते का मन जरूर करेगा। यहां पर एक द्वार है जिसे अवनी द्वार कहा जाता है। इसके बाहर ही एक कृत्रिम झील बनाई गई थी जिसका नाम सागर झील था। इस झील से हाथियों के द्वारा और फिर मनुष्यों द्वारा पानी किले के भीतर लाया जाता था। इसके ऊपर ही किले की दीवारों के साथ लाल और पीले रंग में रंगा हुआ ट्रिपल आर्क गेटवे है। यह पूर्व-पश्चिम दिशा में है और पश्चिम की ओर खुलता है। यह इंडो-फ़ारसी शैली में है। किले के परिसर के भीतर दो मंदिर हैं, एक 10 वीं शताब्दी का राम हरिहर मंदिर और दूसरा 12 वीं शताब्दी का काल भैरव मंदिर है। किले में जल आपूर्ति के लिए अरावली के आसपास जल संचयन संरचनाएं बनाई गई थी। आप देख सकते हैं कि कैसे नहर के माध्यम से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी से पानी किले में बनाई गई टैंको तक पहुंचाया जाता था। अद्भुत था ये। हमारे टूर गाइड ने बताया कि कैसे कछवाहा शासनकालीन खजाने की एक अफवाह के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने इस किले की और इन टैंको की खोज कराई थी आपातकाल के दौरान। खोज तो बेकार गई थी क्योंकि कोई खजाना नहीं मिला था आयकर विभाग और सेना को पर इस खोज की खबर संसद में जरूर ली गई।
ये हिस्सा देख कर और इससे जुड़ी रोचक कहानियां सुन कर हम बढ़ चले अार्मरी की तरफ। यहाँ की अर्मेरी में तलवारों, ढालों, बंदूकों, कस्तूरी और 50 किलोग्राम (110 पौंड) की तोप रखी हुई है । यहां पर जयपुर के महाराजाओं, सवाई भवानी सिंह और मेजर जनरल मान सिंह द्वितीय की पुरानी तस्वीरें हैं, जिन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के रूप में भारतीय सेना में कार्य किया। तस्वीरें देखते हुए आपको राजशाही शान और अंदाज का पता चलेगा।
यहां से हम आगे बढ़े तो आ पहुंचे संग्रहालय में, जो अवामी गेट के बाईं तरफ स्थित है; इसमें जयपुर के रॉयल्टी, टिकटों और कई कलाकृतियों की तस्वीरों का प्रदर्शन किया गया है, जिसमें कार्ड का एक सर्कुलर पैक शामिल है। संग्रहालय में 15 वीं शताब्दी के महलों की हाथ से तैयार मैप भी देखी जा सकती हैं।
ये सब देखने के बाद अब हम जाने वाले थे वो देखने या उसके दर्शन करने जिसके लिए ये किला विश्व प्रसिद्ध है। जिसका ये घर भी माना जाता है। जिसके कमरे की टीनदार छत आपको यहां आते हुए सड़क से ही दिख जाती है। वैसे तो ये किला बहुतायत शस्त्रों का भंडार था,राजपूतों का तोपखाना और फाउंड्री हुआ करता था। पर एक ऐसा शस्त्र है जिसने इसी फाउंड्री में जन्म लिया और आज तक यहीं स्थित हैं। वो है “जयवाण तोप”।
जयवाण तोप का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय (1699-1743) के शासनकाल में जयगढ़ किले की ही एक फाउंड्री में हुआ था। ऐसा यहां एक बोर्ड पर लिखा हुआ है,और हमारे गाइड ने भी यही बताया कि तोप को केवल एक बार 100 किलोग्राम बारूद के चार्ज के साथ निकाल दिया गया था और जब फायरिंग की गई तो लगभग 35 किलोमीटर की दूरी तय की गई। यह इसकी ट्रायल फायरिंग थी। इसके बाद इसे कभी उपयोग नहीं किया गया क्योंकि कभी उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। हम सबने इतिहास थोड़ा बहुत पढ़ा है और हम सब जानते हैं कि राजपूतों के तत्कालीन हिंदुस्तान के शासकों अर्थात् मुगलों के साथ बहुत अच्छे और पारिवारिक संबंध भी थे। जिसके कारण उनके बीच कभी युद्ध की स्थिति ही उत्पन्न नहीं हुई। ये जयगढ़ किले पर हमारा आखिरी पड़ाव था। हम पहले ही दोपहर के 2 बजा चुके थे इसलिए अब हमें आमेर फोर्ट की तरफ निकलना था।
सुबह से घूमते घूमते अब भूख भी दस्तक दे चुकी थी। सो हमने किले से बाहर निकलते हुए ही वहां बने हुए रेस्टोरेंट और टी स्टॉल से कुछ हल्का नाश्ता खा पी लिया।
अब हम वापस अपने ऑटो के पास आ गए,ऑटो वाले भाई वही इंतज़ार कर रहे थे हमारे लिए। उन्होंने हमसे कहा भी कि आपने बहुत समय लगा दिया जयगढ़ में,ऐसा भी क्या है यहां। हमने विनम्रता से उनसे कहा कि भाई हम दिल्ली से यहां तक बस टहलने नहीं आए है। इतिहास को देखने, महसूस करने,समझने और उसे जीने आए हैं। उन्होंने भी हमारी बातों पे अपनी हामी भरी और हम चल पड़ें आमेर फोर्ट की तरफ।
उन्हीं रास्तों पर वापस लौट रहे थे पर फिर भी वो नया लग रहा था। जाते हुए ये पहाड़ मुझसे दूर थे क्यों की मै खाई की तरफ बैठी हुई थी और अब ये मेरे पास थे। सूखे बेज़ार जैसे जीवन ही ना हो उसमे। पर ये कैसे हो सकता है, लाखों जीवों और पेड़ पौधों को अपने आंचल में पालने वाले इस पहाड़ में जीवन ना हो ये कैसे हो सकता है। बेशक ये हमसे कहीं ज्यादा जीवित है क्योंकि ये दूसरो को जीवन और आसरा देती है। ये बातें अभी जहन में चल ही रही थी कि ऑटो के हॉर्न ने मुझे वापस इस दुनिया में ला पटका। तब मैंने देखा कि ये आसान नहीं होने वाला था। बहुत ज्यादा भीड़ थी यहां। उस वक़्त भी खुशी बस इसी बात की थी कि हमारे पास टिकट पहले से थे। सो इस भीड़ को देखते हुए हमने सोचा क्यों ना पहले भोजन कर लिया जाए। वहां किले के सामने कुछ रेस्टोरेंट दिख रहे थे। सो हम जा पहुंचे वहां। अपनी क्वालिटी के हिसाब से ये रेस्टोरेंट काफी महंगे थे, पर मजबूरी भी थी, लंच तो करना था। वो भी वेजेटेरियन खाना। यहां आपको नॉन वेज भोजन नहीं मिलेगा। लंच करके हम चल पड़े आमेर फोर्ट की तरफ।
इस किले को नीचे से देखते हुए मेरी तो नज़रें ही नहीं हट रही थी इससे। बेहद खूबसूरत महल। जब आप पहाड़ी के नीचे स्थित मावठा झील में देखते हैं तो ऐसा लगता है मानो ये किला अपनी खूबसूरती निहार रहा है इस झील में। किले की पूरी छवि को इस झील में देखना अद्भुद एहसास देता है। झील के बगल में बने मार्ग से जब आप किले की तरफ बढ़ते हैं तो एक अलग तरह का रोमांच होता है मन में। आपको भी राजशाही होने का भ्रम हो सकता है। आमेर पैलेस यूं तो यहां से बहुत पास दिखता है पर असल में वो अभी बहुत दूर है।
यहां बिना अल्प या पूर्ण विराम लिए शुरू हो चुके थे हमारे गाइड महोदय –
कचवहा राजपूत मानसिंह प्रथम ने इसका निर्माण 1558-1592 के मध्य कराया। जिसका पुनर्निर्माण और सुधार कार्य सवाई जयसिंह ने कराया। यह किला लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना हुआ है। यह किला व महल अपने कलात्मक विशुद्ध हिन्दू वास्तु शैली के घटकों के लिये भी जाना जाता है। किला विशाल प्राचीरों, द्वारों की शृंखलाओं और पत्थर के बने रास्तों से भरा हुआ है। पत्थर के ये ढलानदार और कभी कभी सीढ़ी नूमा रास्ता इतना लंबा है कि किसी भी व्यक्ति को थका सकता है। पर इनपर चल कर किले तक पहुंचने की वो चाह थकान को आप पर हावी नहीं होने देती है।
सीढ़ियां तो अब तक बहुत चढ़ ली थी हमने। अब हम पहुंच चुके थे किले की मुख्य द्वार पर। हालांकि ये किला 4 मुख्य भागों में बंटा हुआ है और प्रत्येक के अपने प्रवेश द्वार और अपने विशाल प्रांगण हैं। हम सब भी सूरज पोल से होते हुए जलेब चौक आ पहुंचे। यह इस किले का मुख्य और सबसे विशाल प्रांगण है गाइड महोदय ने हमे बताया कि किसी युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात इसी प्रांगण में विजय जुलूस निकाली जाती थी। पूर्व दिशा की तरफ खुलने की वजह से ही इस द्वार का नाम सूरज पोल रखा गया था। राजशाही अतिथियों के महल में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार होने के साथ साथ भगवान सूर्य नारायण के महल में प्रवेश का भी यही मुख्य द्वार था। जलेब चौक दरअसल अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब होता है सैनिकों के एकत्रित होने का स्थान। इसका निर्माण सवाई जय सिंह के शासनकाल (1693-1743 ई॰) के बीच किया गया था। इस प्रांगण के बगल में ही अस्तबल बना है, जिसके ऊपरी तल पर राजा व राजपरिवार के अंगरक्षकों के निवास स्थान थे।
जलेब चौक से हम आगे बढ़े और एक सीढ़ीनुमा रास्ते से हुए महल के मुख्य भाग में आ पहुंचे। यहां प्रवेश करते हुए दाई तरफ शीला देवी का मंदिर है,जिसके द्वार का निर्माण चांदी के पर्त से किया गया है। उसपर उभरी माँ दुर्गा के नौ स्वरूप देखते बनते हैं। हमारी टाइमिंग आज फिर गलत ही थी क्योंकि एक बार फिर मंदिर के कपाट बंद थे। सो हमलोग ने भी बाहर से ही माता रानी को मन में स्मरण करके प्रणाम किया और आगे बढ़ चले।
प्रथम प्रांगण से होते हुए सीढ़ी द्वारा हम द्वितीय प्रांगण में पहुंचे, जहां दीवान-ए-आम बना हुआ है,नाम से ही पता चलता है कि इसका प्रयोग जनसाधारण के दरबार हेतु किया जाता था। दोहरे खंभो की कतार से घिरा दीवान-ए-आम संगमरमर के एक ऊंचे चबूतरे पर बना लाल बलुआ पत्थर के 27 खंभों वाला हॉल है। इसके खंभों के ऊपरी भाग पर जो कि हॉल के छत से लगती हैं,उस पर हाथी के शीश रूपी स्तंभशीर्ष बने हैं एवं उनके ऊपर अन्य सुंदर चित्र उकेरे गए हैं। यह एक खुला हुआ बड़ा हॉल है। हम ऐसे वक़्त पर जयपुर आए थे जो राजस्थान पर्यटन का सबसे व्यस्त समय होता है। इसका प्रमाण हमें हर जगह मिल रहा था। इस वक़्त दीवान ए आम सचमुच दीवान ए आम ही लग रहा था,बहुत सारे लोग थे यहां। प्रजा थी, कमी बस महाराज की थी।
इसके बाद हम बढ़े गणेश पोल की तरफ। नाम से ही जाहिर है इस द्वार का नाम भगवान श्री गणेश के नाम पर था क्योंकि इस द्वार के ठीक ऊपर श्री गणेश की सुंदर प्रतिमा है। यह द्वार है इस किले के तीसरे प्रांगण का, जो की महाराज का निजी आवास होता था। इस द्वार के ऊपर सुहाग मन्दिर बना हुआ है, जहां से राजवंश की महिलायें दीवान-ए-आम में आयोजित हो रहे समारोहों आदि को बिना किसी की नजर में आए झरोखों से देखा करती थीं। इस द्वार की नक्काशी और चित्रकारी आपको इसे देखते रहने के लिए मजबूर जरूर करेगी। हमारे गाइड ने बताया कि इस द्वार के कलात्मक चित्रों का बखान सुनकर मुग़ल बादशाह औरंगजेब इतना चिढ़ गया था कि उसने इसे बनाने वाले सभी कारीगरों को मौत की सजा सुना दी और इन चित्रों को चुने व गारे से ढकवा दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान सभी तरह के कला पर प्रतिबंध लगा रखा था। पर समय के साथ जैसे जैसे ये चुने व गारे की परत गिर रही है वैसे वैसे इन चित्रों को देखा जा सकता है। इस द्वार की खूबसूरती आपको अपने साथ तस्वीर लेने के लिए सौ प्रतिशत मजबूर करेगी। हमने भी तस्वीरें ली और आगे बढ़े और द्वार को पार करते हुए प्रवेश कर गए किले के उस भाग में जो राज परिवार का निजी आवास था। इसे देख कर जो पहली बात मन में अाई वो थी..”परियों के देश जैसा” है ये सब। मुगल बाग शैली के अनुसार मध्य में बने उद्यान के दोनों तरफ ठीक आमने सामने बनी 2 बेहद खूबसूरत इमारतें। क्रमशः जय मंदिर( शीश महल) और सुख महल।
प्रवेशद्वार के बायीं ओर की इमारत को जय मन्दिर कहते हैं। इस महल की दीवार संगमरमर की हैं जिसपर शीशे से जड़े हुए है और इसकी छत पर भी बहुरंगी शीशों का उत्कृष्ट प्रयोग कर अतिसुन्दर मीनाकारी व चित्रकारी की गयी है। अगर आप ध्यान से देखें तो इसके शीशे अवतल हैं जिसकी वजह से ये मोमबत्ती के प्रकाश में तेज चमकते एवं झिलमिलाते हुए दिखाई देते हैं। इसका निर्माण इस तरीके से शायद इसलिए किया गया था क्योंकि उस समय सूर्यास्त के बाद यहाँ मोमबत्तियों का ही प्रयोग किया जाता था। शीशे से जड़े होने के कारण ही इसे शीश-महल कहा जाता था। शीश महल का निर्माण मान सिंह ने 16वीं शताब्दी में करवाया था और ये 1727 ई॰ में पूरा हुआ। यहां लगे बोर्ड के अनुसार यहां की दर्पण एवं रंगीन शीशों की पच्चीकारी, मीनाकारी और नक्काशी को देखते हुए कहा गया है कि जैसे “झिलमिलाते मोमबत्ती के प्रकाश में जगमगाता आभूषण सन्दूक “। जय मंदिर से मावठा झील बहुत सुंदर दिखता है। हालांकि समय के साथ साथ 1970-80 के दशक तक इस महल की कारीगरी लगभग खत्म होने के कगार पर थी जिसे देखते हुए इसका पुनरोद्धार एवं नवीनीकरण कार्य आरम्भ कराया गया जिसकी बदौलत यह महल अपनी मिटती हुई खूबसूरती को वापस पा सका। यह महल निहायत ही खूबसूरत है। इसे देखते हुए कब इतना समय निकल गया हमे पता भी नहीं चला। हम अब इस मुगलिया अंदाज से बने बाग के बगल से शाही अंदाज में टहलते हुए आगे बढ़ रहे थे,कमी केवल हाथों में एक गुलाब के फूल और सिर पर ताज की थी। इसी अंदाज के साथ हम पहुंचे दूसरे प्रांगण में जिसे सुख निवास या सुख महल नाम से जाना जाता है। चंदन की लकड़ी से बना है इस भवन का प्रवेश द्वार जिसमें जालीदार संगमर्मर का कार्य है। गाइड ने बताया कि कैसे पाइपों से लाया गया पानी यहां एक खुली नाली द्वारा बहता रहता था, जिसके कारण इस भवन का वातावरण राजस्थान कि भयंकर गर्मी में भी ठंडा बना रहता था। इन नालियों से होते हुए यह पानी उद्यान की क्यारियों में जाता था। इस महल का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार एक डोली जैसा ही है। डोली महल से पहले एक भूल-भूलैया भी बनी है। इसके बारे में बताते हुए शायद हमारे गाइड को भी बहुत मजा आ रही थी। वो बहुत रोचक तरीके से बता रहा था कि यहाँ पर महाराजा अपनी रानियों और पटरानियों के साथ लुका छिपी का खेल खेला करते थे। राजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब वे लड़ाई से लौटकर आते थे तो सभी रानियों में उनसे सबसे पहले मिलने की होड़ लग जाती थी। तब राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में घुस जाते थे और जो रानी उन्हें सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी, बिना विवाद उसके साथ चले जाते थे। इतने उत्साहित और आनंद में हमारे गाइड महोदय अभी तक किसी भी भवन में नहीं थे,यह तक की शीश महल में भी नहीं जहां हम सब इतने उत्साहित थे।
इस प्रांगण के दक्षिण में मानसिंह प्रथम का महल है और यह महल का सबसे पुराना भाग है। यह महल राजा मान सिंह प्रथम के शासन काल (1589-1614 ई॰) के दौरान 1599 ई॰ में बन कर तैयार हुआ। यह यहां का मुख्य महल है। इसके केन्द्रीय प्रांगण में खंभों वाली बारादरी ( एक प्रकार का बैठक,जिसके 12 द्वार होते हैं) है जिसकी सजावट रंगीन टाइलों एवं भित्तिचित्रों द्वारा निचले व ऊपरी, दोनों ही तल पर की गई है। इस महल को बाकी महल से अलग और एकांत में बनाये रखने के कारण पर्दों से ढंका जाता था और इसका प्रयोग यहां की महारानियां अपनी बैठकों और मिलने जुलने के लिए किया करती थीं। महल के इसी भाग में जनाना ड्योढ़ी है, जिसमे राजमाता, पटरानी और राजपरिवार की अन्य महिलाएं रहती थी। उनके साथ में ही दासियों के कमरे भी बने हुए हैं। यहाँ पर जस मन्दिर नाम से एक निजी कक्ष भी है, जिसमें कांच के फ़ूलों की महीन कारीगरी की गई है और साथ में प्लास्टर ऑफ पेरिस से नक्काशी भी कि गई है। इस किले या महल को देखते हुए आप समझ सकते हैं राजपूती वास्तुकलाके क्षेत्र में कितने धनी थे और अन्य किसी शैली को अपनाने में भी वो गुरेज नहीं करते थें। पी
इसकी राजपूताना – मुग़ल शैली कि अद्भुद वास्तु और शिल्प कला को देखते हुए ही यूनेस्को ने इसे राजस्थान के अन्य 5 पर्वतीय किलों (चित्तौड़ किला, गागरौन किला, जैसलमेर किला, कुम्भलगढ़ किला एवं रणथम्भोर किला) के साथ 2013 में विश्व धरोहरों में सम्मिलित किया।
इस किले/पैलेस में बहुत सारी बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों जैसे जोधा अकबर, मुगल ए आजम, भूल भुलैया, शुद्ध देसी रोमांस, नार्थ वेस्ट फ़्रन्टियर, और द बेस्ट एग्ज़ॉटिक मॅरिगोल्ड होटल आदि की शूटिंग हो चुकी है। हाल फिलहाल फिल्म बाजी राव मस्तानी के लिए मोहे रंग दो लाल गीत में हम मावठा झील और कैसर बाग़ को बैंक ग्राउंड में देख सकते हैं। यह महल जितना खूबसूरत इन फिल्मों में दिखाया गया है उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत आप इसे अपने सामने से पाएंगे। बस वहां जाकर एक बार इतिहास को महसूस कीजिए।
हालांकि जानकर बहुत दुख हुआ कि किसी फिल्म की शूटिंग के लिए सेट निर्माण के दौरान इस किले की जालेब चौक, चांद महल और कुछ अन्य स्थानों को काफी नुकसान हुआ था। जिसकी वजह से कोर्ट ने दखल देकर शूट को रोक दिया था। हम सब को ये ध्यान रखना चाहिए कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत है, ये हमारे देश के गौरवशाली इतिहास का जीवित प्रमाण है और हम जब भी ऐसे किसी स्थान पर जाते हैं तो हमें इनकी सुरक्षा और सफाई का ध्यान रखना चाहिए। अगर दूसरे देशों से आए हुए लोग इन बातों का ध्यान रख सकते हैं तो हम क्यों नहीं।
हमने आमेर फोर्ट देख तो लिया था पर बहुत ज्यादा भीड़ होने की वजह से हम उस हद तक संतुष्ट नहीं थे जैसा की हमे होना चाहिए था,और हो भी क्यों ना आखिर शिद्दत से इसे देखने की इच्छा थी इसे हमारे दिलों में। खैर शाम हो रही थी इसलिए हमे यहां से निकलना भी था। इस बीच में ऑटो वाले भाई की कॉल भी आ चुकी थी 2-3 बार। अब हमे निकलना ही था। बाहर आते हुए पास की मिठाई की दुकान से हमने प्रसाद लिया और भैरवनाथ जी मंदिर के( छोटा सा मंदिर है यहां) दर्शन किए। फिर निकल पड़े सीढ़ियों से उतरते हुए अपने ऑटो की तरफ।
काफी भीड़ होने की वजह से हमारी ऑटो हमसे लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर लगाई थी भाई ने। हम ऑटो ढूंढ रहे थे तभी ऑटो वाले भाई हमे दिख गए और अपने साथ ऑटो तक ले गए। हुजूम लोगो का इस कदर था की गाड़ियों को स्टैंड से बाहर निकलने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी और निकलने के बाद वो वहां खड़े नहीं हो सकते थे अपनी सवारी को बैठाने के लिए। सो जैसे ही ऑटो वाले भाई ने ऑटो निकाली वो हमसे लगातार फटाफट बैठ जाने के लिए कहने लगे जब तक कि हम सब रेंगती हुई ऑटो में बैठ नहीं गए। अब हम पहाड़ों की ठंडी हवा अपने चेहरों पर लेते हुए और आत्मा तक उतारते हुए बढ़ चले थे हवा महल की तरफ। वाकई दिन भर जितनी गर्मी थी यहां दिसंबर के महीने में, शाम के वक़्त की हवा उतनी ही ठंडी थी पर इस हवा ने हमारी सारी थकान को भी जैसे अपने झोंको से कहीं उड़ा दिया था। हम एक बार फिर तरो ताज़ा हो गए थे। हम जैसे ही जल महल के सामने पहुंचे,हमारे ऑटो चालक ने बताया कि यहां इस वक़्त गाड़ी लगाने की अनुमति नहीं है,इसलिए मै 5-10 मिनटों के लिए कहीं ऑटो लगा लेता हूं और आप सब जल महल के तस्वीरें लेकर आ जाइए। हमें भी ठीक लगी ये बात क्योंकि जल महल
मान सागर झील के बीचों बीच बना हुआ है और आप इसे पास जाकर नहीं देख सकतें। हम ऑटो से उतरकर रोड पार करते हुए आ गए उस स्थान पर जहां खड़े होकर लोग जलमहल के साथ तस्वीरें लेते हैं। जलमहल को आईबॉल के साथ साथ रोमांटिक महल के नाम से भी जाना है। रोमांटिक क्यों,ये तो आप जब इसे देखेंगे तो जान जाएंगे। महाराजा जयसिंह अपनी रानियों के साथ रोमांटिक समय बिताने यहां आया करते थे। यह वर्गाकार दो मंजिली इमारत राजपूताना शैली में बनाई गई है। हमने सुना कि चांदनी रात में मान सागर झील के पानी में यह महल बेहद खूबसूरत दिखता है। आप चांदनी रात में भले ना देख पाएं इस महल को लेकिन आप इस बात पर विश्वास जरूर कर लेंगे क्योंकि बग़ैर चांदनी रात के भी झील के पानी में ये महल बहुत खूबसूरत दिखता है। जलमहल को अब पक्षी अभ्‍यारण के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। यहाँ की नर्सरी में 1 लाख से अधिक वृक्ष लगे हैं जिसमें राजस्थान के सबसे ऊँचे पेड़ भी पाए जाते हैं।
जलमहल के आसपास कपड़ों के,आर्टिफिशियल ज्वेलरी के, सजावट की वस्तुओं के लिए छोटी छोटी दुकानें हैं और बच्चो के लिए कुछ एक्टिविटी उपलब्ध हैं। यहां पर भी जल महल के साथ पारंपरिक वेशभूषा में तस्वीर बनाने वाले मिल जाएंगे जो 100/पिक्चर के हिसाब से तस्वीर बनाते हैं।
यहां जल महल के पास भी 20-25 मिनट गुजार कर हम अपने होटल को आ गए। ये था हमारा जयपुर में व्यस्ततम और हां थका देने वाला दिन, पर वो कहते हैं ना “फूल पैसा वसूल” ,यही दिन था ये हमारे लिए।

हमारे बीच वो लोग अभी जिंदा हैं: जयपुर (भाग -2)

दूसरा दिन

आज की यात्रा के लिए एक रोज पहले ही गाड़ी के लिए हमारी बात हो चुकी थी एक लोकल ट्रैवल एजेंट से। एक पूरे दिन के लिए 1300 में स्विफ्ट डिजायर आने वाली थी। हम सब खुश थे की आज ऑटो से सफर नहीं करना पड़ेगा। पर काफी समय बीत जाने के बाद भी हमारी सवारी का कोई अता पता नहीं था। एजेंट से बात करने के बाद पता चला कि वो गाड़ी नहीं भेज पाएगा। ये सरासर उसकी लापरवाही थी। उसने हमारा बहुत सारा समय खराब कर दिया था। अब हमारे पास अपना प्लान रीशड्यूल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। हमने अब जयपुर शहर के अंदर रह कर ही घूमना ठीक समझा। इसलिए हमने उबर पर कैब बुक की और निकल पड़े हवा महल की तरफ।
हम अब कैब में थे। रास्तों को ध्यान से देखते हुए आगे बढ़ रहे थे और एक चीज जो मैंने और मेरी दीदी दोनों ने महसूस की थी वो ये कि यहां लोकल महिलाएं बहुत कम दिखाई दे रही थी।
कुछ समय कैब में गुजारने के बाद अब आगे हमारे सामने था एक बड़ा गेरुआ लाल सा बड़ा गेट । हमारे कैब चालक ने बताया इसका नाम सांगानेरी गेट है। गुलाबी शहर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वारों में से एक। इसका निर्माण पारंपरिक राजपूताना शिल्प कला के आधार पर ही किया गया था। यह जौहरी बाज़ार ( सोने चांदी के आभूषणों के भंडार के रूप में जाना जाता है। ) के ठीक सामने स्थित है। इसमें प्रवेश करते ही जैसे हम अलग दुनिया में आ गए थे। सड़क के दोनों तरफ एक ही रंग और एक ही साइज की दुकानें थी। अलग सा नज़ारा था ये बिल्कुल। ये सभी दुकानें टेराकोटा पिंक कलर से रंगी हुई थी। इसी वजह से इसे पिंक सिटी का नाम दिया गया था। हमारे कैब ड्राइवर ने कहा इसके पीछे भी इतिहास है। आप सुनना चाहेंगे? हमने एक स्वर में कहा कि जी बिल्कुल सुनाइए,इतिहास देखने,सुनने और महसूस करने के लिए ही तो हम दिल्ली से यहां जयपुर आए हैं। तब उन्होंने बताना शुरू किया, जिसके अनुसार यहां के महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने प्रिंस अल्बर्ट के 1776 में हिंदुस्तान में 17 सप्ताह के प्रवास के दौरान उनको प्रभावित करने,खुश करने और अपने राजपरिवार और ब्रिटिश राजघराने के बीच आपसी अच्छे संबंध विकसित करने के लिए राजा जी ने प्रिंस अल्बर्ट के नाम पर एक हॉल का निर्माण कराया जिसे अल्बर्ट हॉल कहा जाता है और उसके साथ ही उनके स्वागत में इस शहर के मध्य भाग को टेराकोटा गुलाबी रंग से रंगा दिया। वास्तव में हमारे कैब चालक भी किसी टूर गाइड से कम नहीं थे। उन्होंने हमें हवा महल के सामने छोड़ दिया। उनको धन्यवाद देते हुए जब हमने अपना ध्यान हवामहल की तरफ मोड़ा तो जो पहला इंप्रेशन हवा महल का खास करके मेरे ऊपर पड़ा वो ये था की उसके ऊपर बेतहाशा धूल जमी हुई थी, पॉल्यूशन का शिकार थी ये बेहतरीन इमारत। इस ऐतिहासिक इमारत से ज्यादा साफ तो वो रास्ते में दिखने वाली दुकानें थीं। शायद उन दुकानों की देखरेख करने वाले ज्यादा कर्मठ थे। बाहर से हमने इसे ठीक से निहारा तस्वीरें लीं। यहां दिसंबर आखिरी के दिनों में भी बहुत गर्मी थी शायद इसलिए यहां नारियल पानी की बिक्री जोर शोर से हो रही थी। यहां पास में ही कुछ राजस्थानी पगड़ी बेचने वालों की भी दुकानें थी जो 50 रुपए एक पीस के हिसाब से पगड़ी बेच रहे थे। देशी तो देशी विदेशी पर्यटकों में इन पगड़ियों को लेकर अलग ही उत्साह था।सभी इन रंग बिरंगी पहाड़ियों में दिखाई दे रहे थे।
रघुनाथ जी को प्रणाम करते हुए हम सीढ़ियों से नीचे उतरे उस मार्ग पर जो जाता है हवा महल की तरफ। सीढ़ियों के नीचे ठीक बगल से ही एक बार फिर दुकानें शुरू हो जाती हैं। हर दुकान से कम से कम 2 लड़के लोगो को घेर रहे थे पारंपरिक राजस्थानी परिधान में फोटो बनवाने के लिए। इस परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों के अलावा बच्चों के लिए खिलौने और खाने – पीने की चीजें भी उपलब्ध है।
सीढ़ियों से नीचे उतरते ही जो नज़ारा सामने आया वो देखने लायक था। वहां टिकट काउंटर पर 200 से ज्यादा लोगो की लंबी कतार थी। ये देख कर हमारे तो होश ही उड़ गए थे। कतार को देख कर मुझे हंसी भी आ रही थी, रोना भी और गुस्सा भी। फिर हमने निर्णय लिया कि आज हवा महल रहने देते हैं। कुछ मिनटों में ही ये फाइनल हो गया कि अब इस एरिया की सभी चीजे आखिरी दिन घूमेंगे। इस तरह जो दिन हमने पुष्कर के लिए बचा कर रखा था अब वो हवा महल, जंतर मंतर, इसार्लेट और अल्बर्ट हॉल को समर्पित हो गया था।
सो बचे हुए समय का सदुपयोग करने के लिए हम सब सिटी पैलेस की तरफ निकल पड़े। वहां भी टिकट की लाइन थी। पर इतनी लंबी नहीं थी कि हम वहां खड़े ना हो सकें। मै लाइन में लग गई। 130/ व्यक्ति के हिसाब से मैंने भी टिकट ले लिए।
एक पर्यटक होने के नाते हम सब एक बार फिर एक्साइटेड हो गए थे। फिर हम चल पड़े सिटी पैलेस के भीतर। बताती चलु की सिटी पैलेस की बाहरी दीवारों का निर्माण जय सिंह द्वितीय द्वारा कराया गया था, जब की भीतर के महल का निर्माण कार्य समय के साथ साथ अन्य लोगो द्वारा कराया जाता रहा। यह पैलेस निःसंदेह मुगल और राजपूती कला के संगम का जीता जागता उदाहरण है।
अंदर प्रवेश करते ही ठीक सामने कठपुतलियों का शो चल रहा था यानी पपेट शो। पुपेट शो राजस्थान कि विशेषता है। आप कहीं भी जाएंगे आपको ये देखने को जरूर मिलेगा। जैसे कि कल नाहरगढ फोर्ट में भी हमने ये देख था। बात अलग है कल हम रुक कर वो एन्जॉय नहीं कर पाए थे। ये शो देखना भी अनोखा अनुभव था। हमने उसे भरपूर एन्जॉय किया और शो मास्टर्स को कुछ पेशगी दी जिसे खुशी खुशी उन्होंने एक्सेप्ट किया। इन पपेट को आप 250 रुपए के दर से खरीद भी सकते हैं। शिकायत इन पपेट शो से बस इतनी है कि ये शो अब पारंपरिक लोक गीतों पर नहीं बल्कि बॉलीवुड के गीतों पर दिखाए जाते हैं।
शो देख कर हम आगे बढ़ निकले, जहां से सबसे पहले सामने दिखता है मुबारक महल-
वीरेंद्र पोल से अंदर घुसते हुए, हमने 19 वीं शताब्दी के अंत में महाराजा माधोसिंह द्वितीय के लिए बनाए गए मुबारक महल को देखा, जो गणमान्य व्यक्तियों के लिए एक स्वागत केंद्र के रूप में बनाया गया है। इसका निर्माण इस्लामिक, राजपूत और यूरोपीय शैली में वास्तुकार सर स्विंटन जैकब द्वारा किया गया था। अब यह महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय का हिस्सा है, जिसमें कश्मीरी पश्मीना सहित शाही वेशभूषा और शानदार शॉल का संग्रह है। यहां पर सवाई माधोसिंह के कपड़ों को देखा जो कि सामान्य कपड़ों से बिल्कुल अलग था या यूं कहो बहुत बड़ा था। गाइड ने बताया कि महाराजा सवाई माधो सिंह जी 2 मीटर लंबे, 1.2m चौड़े और 250kg वजनी शक्स थे । अब हमे समझ आ गया था कि ये वस्त्र ऐसा क्यों था क्योंकि उसके पहले तो हम अपने ही तर्क भिड़ाए जा रहे थे।
इसके बाद हम आर्मरी पहुंचे। यह देश में हथियारों का सबसे अच्छा संग्रह माना जाता। इसे देखने के बाद निःसंदेह मै भी यह कह सकती हूं कि यह देश के शास्त्र संग्रहों में सबसे बेहतरीन है। कई वस्तुओं और हथियारों को भव्यता से उकेरा और जड़ा गया है। शास्त्रों से लगाव रखने वाले लोग यहां निश्चित रूप से खो सकते हैं। शास्त्रों का अद्भुद संकलन है यहां। अगर आप भी पूरी तरह डूब जाएं इस आर्मेरी में तो निश्चित रूप से आप भी वीर रस की कविताओं से ओतप्रोत हो जाएंगे।
कविताएं सुनते सुनाते हम सब बढ़ चले थे दीवान-ए-ख़ास की तरफ जिसे संस्कृत में सर्वतोभद्र कहा जाता है(यह शब्द ज्ञान मुझे वहीं पर प्राप्त हुआ)। आर्मरी और दीवान-ए-आम आर्ट गैलरी के बीच ये पिंक और व्हाइट मार्बल का बना खुला प्रांगण है जिसका उपयोग दीवान-ए-ख़ास (हॉल ऑफ़ प्राइवेट ऑडियंस) के रूप में किया जाता था, मतलब जाहिर है की ये वो जगह है जहाँ महाराजा अपने मंत्रियों से सलाह लेते थे/देते थे। यहां पर दो बड़े, दरअसल विशाल कहना ज्यादा ठीक रहेगा सो हां यहां पर 2 विशाल चांदी के बर्तन/पात्र रखे हुए हैं, जो लगभग 1.6 मीटर लम्बे हैं। इनको गंगाजली कहते हैं। ऐसा कहा जाता है राजा के लिए इन्हीं पात्रों में गंगा नदी का जल लाया जाता था क्योंकि वो केवल यही जल पीते थे। जो भी हो आज के डेट में ये पात्र दुनिया की सबसे बड़ी चांदी की वस्तुओं के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं। अब हम आम जनता के दरबार यानी दीवान-ए-आम पहुंचे। यह बेहतरीन आर्ट गैलरी है। यहीं पर भागवत गीता सहित अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथो की हाथ से लिखी हुई इतनी छोटी प्रतियां है। मुगल सेना के भय से इनको इस प्रकार संकलित किया गया था ताकि उन्हें छिपाया जा सके और मुगल सेना उन्हें नष्ट ना कर पाए। ये वाकई आई कैचिंग था।
महल के इनर कंपाउंड की ओर बढ़ने पर प्रीतम निवास चौक है। यहां चार शानदार द्वार हैं जो चार मौसमों का प्रतिनिधित्व करते हैं – मयूर गेट शरद ऋतु , लोटस गेट ग्रीष्म, ग्रीन गेट वसंत, और अंत में रोज गेट जो सर्दियों का प्रतीक है।
इस चौक के आगे ही चंद्र महल है जो अभी भी शाही परिवार के वंशजों का निवास स्थान है और यहां पर कोई भी कुछ सिलेक्टेड एरिया में 45 मिनट का रॉयल ग्रैंडराइड गाइडेड टूर ले सकते हैं। यहां पर अंदर पिक्चर लेना सख्त मना है। 500रुपए दण्ड शुल्क भी है हर एक पिक्चर पर। मैंने ये नोट पढ़ा नहीं और हॉल की खूबसूरती को देखते देखते कब मेरे फ़ोन से पिक्चर्स लेने लगी पता नहीं चला और ये भी पता नहीं चला कि कब एक गार्ड मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। उसने मुझसे कहा मैडम अपना फोन दीजिए।
मैंने कहा क्यों भाई?
उसने कहा आपने शायद बाहर बोर्ड नहीं पढ़ा। उसपर लिखा है फोटो लेना मना है।
मैंने कहा ठीक है,नहीं लूंगी फोटो।
फिर उसने कहा अपना फोन लाइए, ये बोलते हुए ही मेरे हाथ से अचानक मेरा फ़ोन लेकर वो एक दूसरे गार्ड के पास जा पहुंचा। मै समझ नहीं पाई ये क्या हुआ अभी। मै भी पीछे पीछे गई। मैंने पूछा भाई क्या चल रहा है। क्या प्रॉब्लम है?
उसने कहा हम सारी पिक्चर डिलीट कर रहे हैं।
मैंने थोड़ा शख्त होकर कहा, फोन किसी की भी निजी संपत्ति होती है, आप ऐसे लेकर उसमे कुछ नहीं कर सकते। आप मुझे फोन दीजिए मै खुद यहां की पिक्चर डिलीट कर दूंगी।
ये सुन कर उसने फोन लौटा तो दिया पर लगातार मेरे फोन में झाकता रहा जब तक कि मैंने उस हॉल की सारी पिक्चर्स डिलीट नहीं कर दी। धन्यवाद बोलते हुए उसने कहा मैडम आपके फोन का कैमरा बहुत अच्छा है बस फोन थोड़ा भारी है।
मैं बदले में उसे आंखे तरेर कर देखते हुए पीछे मूड गई और बाकी सबके साथ हो ली।
सिटी पैलेस का एक एक कोना ठीक से निहारने और समझने के बाद हम वहां से रुखसत हुए। पैलेस गेट से बाहर वर्तमान की दुनिया में आ गए। कुछ हल्का फुल्का नाश्ता भी कर लिया सबने। शाम हो चली थी। गुलाबी शहर और भी खूबसूरत दिखने लगा था। हम साइड लेन पर टहलते हुए आगे बढ़ रहे थे। शाम की नेचुरल रोशनी और आर्टिफिशियल लाइट्स में हवा महल कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रहा था शायद इसलिए और भी की अब उसपर जमी धूल नहीं दिख रही थी। हम लेन पर खड़े होकर उसे देखने लगे। फिर मैंने कुछ पिक्चर भी कैमरे में उतार लिए। टहलते हुए ही हम उत्सुकतावश यहां की कई दुकानों के अंदर गए तो देखा की हमें प्रवेश करने के लिए दुकानों में 2 सीढ़ी नीचे उतरना पड़ता था। जब हमने दुकानदारों से इसकी वजह जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि ये ग्राहकों का स्वागत करने का उनका तरीका है। उनका ये लॉजिक कुछ समझ नहीं आता था फिर भी हम उनके इस उत्तर पर मुस्कुरा देते थे।
कैब का इंतज़ार करते हुए हम सब चर्चा कर रहे थे कि सरकार को इस लेन में कम से कम शाम के वक़्त गाड़ियों की आवाजाही बंद कर देनी चाहिएं। ये लेन शाम के वक़्त टहलते हुए एन्जॉय करने का एक अलग ही अनुभव होता। अभी तो आप जब भी कुछ देखने लगे तभी कोई गाड़ी आ धमकती है आपके और उस नज़ारे के बीच में। बेहद निराशाजनक महसूस होता है उस वक़्त।

इसी निराशायुक्त क्षणों के बीच हमारी कैब आ पहुंची। हम सब सवार होकर होटल आ पहुंचे। कल के लिए आज ही एक ऑटो वाले से बातचीत पक्की हो गई थी। वो कल सुबह ही आ जाने वाला था और कल पूरे दिन वो हमारे साथ रहने वाला था। एक पूरे दिन के लिए 1000 रुपए में हमने उसे तय किया था। अब इंतजार था कल सुबह का क्योंकि आमेर फोर्ट वो जगह थी जहां पूरी शिद्दत से मै जाना चाहती थी। इसी उत्सुकता के साथ आज का दिन हमारे लिए समाप्त हो गया था।

हमारे बीच वो लोग अभी जिंदा हैं: जयपुर (भाग -1)

दिसंबर का महीना था,और हम सब क्रिसमस पर कहीं बाहर जाने की सोच रहे थे। मै आज तक कभी भी पहाड़ों की यात्रा पर नहीं गई पर मेरा दिल कहीं पहाड़ों में ही बसता है,शायद। ये महसूस करने का कारण शायद ये हो सकता है कि मैंने ऐसी बहुत सी फिल्में देखी है, किताबे पढ़ी हैं,लेख पढ़े हैं जिन्होंने पहाड़ों की खूबसूरती को जीवंत आंखो के सामने रखा है। जिसने मुझे वहां जाने की ऐसी भूख दी है जो शायद वहां जाकर ही मिटेगी। मिटेगी या और बढ़ जाएगी ये मुझे अभी नहीं पता। अब तो जब कभी भी कहीं घूमने जाने की बात होती है और मुझसे मेरी इच्छा पूछी जाती है तो मेरी गाड़ी कहीं किसी पहाड़ों के बीच बसे शहर या गाँव में जाकर रुकती है। यही हुआ इस यात्रा के दौरान भी। जब मुझसे पूछा गया तो मानचित्र पर मेरी उंगलियां हिमांचल के धर्मशाला और उत्तराखंड के मंसूरी और नैनीताल पर जा पहुंची। सामने आए अन्य जगहों में गुलमर्ग, मनाली, और शिमला भी थे और मैदानी इलाकों में आगरा और जयपुर। लेकिन हमारे साथ बच्चे के होने की वजह से हमें पहाड़ों को अपनी सूची से बाहर करना पड़ा। आखिर में हम सब की सहमति बनी जयपुर के नाम पर। इसे लेकर हम एक मुगलकालीन जोक भी कर रहे थे। जो था कि चलो पहले हीर कुंवारी (जोधाबाई) का मायका (आमेर फोर्ट) हो आते हैं, उनके ससुराल (आगरा फोर्ट) उसके बाद चलेंगे। हमारी यात्रा कुल 4 दिनों की थी जो 22दिसंबर से 25 दिसंबर तक थी। जिसमे हम शहर के अंदर की महत्वपूर्ण स्थान और पहाड़ों पर खड़े उन किलों को देखना था जो हमारे देश के इतिहास को अपने अंदर समेटे जिंदा खड़े है और समय बचता तो हम पुष्कर भी जाने की सोच रहे थे।

हमें गुड़गांव से जयपुर ट्रेन से ही जाना था क्योंकि यहां से जयपुर जाने में केवल 4-4:30 घंटे लगते हैं।

22 दिसंबर की सुबह 5:20 की ट्रेन थी हमारी। हम सब 4:50 तक घर से निकले थे। हम पहले ही काफी लेट हो चुके थे। हालांकि हमारे उबर ड्राइवर ने बताया कि वो हमे समय रहते स्टेशन पहुंचा देंगे। हम ठीक 5:20 पर स्टेशन पहुंचे। हमें नहीं पता था कि हमारी ट्रेन आने वाली है अभी या पहले ही जा चुकी है। कुछ वक़्त इंतज़ार करने पर हम समझ चुके थे कि हमने अपनी ट्रेन मिस कर दी है। 5-7 मिनट इंतज़ार के बाद वहां रानीखेत एक्सप्रेस अाई। वो भी जयपुर होते हुए जैसलमेर को जाती है। अब हमारी ये यात्रा एक रोमांचक यात्रा बनने वाली थी। जो यात्रा हम 4 घंटे में पूरी करने वाले थे उसके लिए भी हमें 5:30 घंटे का समय लगने वाला था। खैर हम बिना टिकट उस ट्रेन में चढ़ गए, वो भी धीमी रफ़्तार में ही सही पर चलती हुई ट्रेन में। दिसंबर के महीने में ऊनी कपड़ों के अलावा बिना किसी अतिरिक्त कम्बल के शयनयान में यात्रा कितनी दूभर हो सकती है ये तभी पता चला हम सबको क्योंकि हमारी तैयारी तो AC में यात्रा करने की थी, सो बस एक एक जैकेट पहना था हम सबने। जैसा कि मैंने बताया था ये पहाड़ मुझे हमेशा ही अपनी तरफ अट्रैक्ट करते हैं। हिमालय के पहाड़ ना सही, अरावली की टिलाए ही सही। वो भी कुछ कम रोमांचित नहीं कर रही थी। उनका विस्तार भी देखने लायक था या शायद ये मेरे पहाड़ों के प्रति प्रेम के कारण था।मेरी  ट्रेन की पूरी यात्रा इन पहाड़ों को देखते हुए, बाते करते, चाय पीते और ठंड में ठिठुरते ही बित गई।

हम जयपुर स्टेशन पर उतरे और नज़ारा देखने वाला था। ऐसा लग रहा था मानो आधी आबादी दिल्ली और आसपास की यहीं आ गई हो। लोगो का हुजूम था। सर्दी के दिनों में लोग ऐसी ही जगहों पर यात्रा के लिए जाते हैं,और ये समय जयपुर का भी पीक सीजन था। स्टेशन तो बिल्कुल सादा,किसी भी आम छोटे शहर के स्टेशन जैसा था। मै ये इसलिए बता रही हूं क्योंकि मुझे हमेशा ही लगता था कि जयपुर का स्टेशन किसी किले कि तरह दिखता होगा जिससे वहां की विरासत की झलक मिल सके। मै यहां इसकी तुलना करने लगी थी लखनऊ, बनारस, मुंबई टर्मिनल, हावड़ा सरीखे स्टेशन से जिन्हें देख कर वहां की विशेषता का पता चलता है।

एक बात और जो मैंने महसूस की वो ये थी कि यहां के लोगों में धैर्य की बहुत कमी है,इसके उदाहरण हमे समय समय पर मिलते रहे थे पूरी यात्रा के दौरान।

अभी टूर का सीजन शुरू नहीं हुआ था इसलिए हमे हमारी इच्छानुसार कमरा मिल गया था होटल में वरना क्रिसमस के दिन से तो सारे होटल पूरे पैक्ड होते हैं । खैर दोपहर में हम लंच करने के लिए GTR पहुंचे। जिसके पास काबुल से चितगोंग तक(2600 किमी) के स्वादिष्ट व्यंजन आपको मिल जाएंगे। ये वेज और नॉन वेज भोजन के लिए बेहतरीन जगह है। जाड़े के दिनों में दिन जल्दी ढल जाता है और हमे पहले ही काफी देर हो चुकी थी। दोपहर के 3 बज चुके थे सो हम ज्यादा कुछ कर नहीं सकते थे आज। 4:30 तक तो अंधेरा होने लग जाता है तो हम बस होटल के आस पास ही रहना चाहते थे लेकिन जैसे ही हम GTR से बाहर निकले एक ऑटो वाले अंकल ने हमे पकड़ लिया। वो लगातार एक टूर गाइड की तरह हमें जानकारी दिए जा रहे थे कि हम इस वक़्त क्या क्या कर सकते हैं,कौन सी जगहें देख सकते हैं, और हम सब अच्छे टूरिस्ट की तरह सुनते जा रहे थे। उन्होंने कहा वो हमें 800 में नाहरगढ़ किला और आसपास की जगहें और मार्केट लेकर चलेंगे। हमने पहले से कोई होमवर्क नहीं किया था इस ट्रिप के लिए (क्योंकि ये लास्ट मोमेंट पर बनने वाले ट्रिप में से एक था , और होमवर्क ना करना हमारी एक बड़ी गलती थी,आप कभी ये गलती ना करें) इसलिए हम उनके साथ ही हो लिए। हम उनकी बताई जानकारी पर विश्वास कर रहे थे लेकिन उनके साथ जाते हुए बीच मार्ग में ही अमेर फोर्ट और जयगढ़ फोर्ट की तरफ जाता हुआ मार्ग देखा हमने। हम समझ चुके थे कि हमसे गलती हो गई थी। हम अगले दिन सुबह निकल कर ये तीनों फोर्ट एक साथ एक दिन में कवर कर सकते थे। फिर भी हमने उन ऑटो ड्राइवर से कुछ कहा नहीं। अभी हम उस जगह पहुंचे थे जो कि नाहर गढ़ फोर्ट से पहले पड़ने वाला एक व्यू प्वाइंट था जहां से आप जल महल का खूबसूरत नजारा देख सकते हैं (जलमहल दरअसल यहां से बहुत खूबसूरत दिखता है, बस आपके पास वो नजर होनी चाहिए और तस्वीर लेने के लिए एक अच्छा कैमरा होना चाहिए क्योंकि वो यहां से काफी दूर है और नीचे है) हम भी वहां रुके, जलमहल की खूबसूरती का बखान किया और वहां पहाड़ी से दिखते हुए पूरे जयपुर शहर को निहारा जो की किसी वैली कि तरह दिख रहा था। ये सब मेरे लिए बिल्कुल मैजिकल था।

हम आगे बढ़े और 15-20 मिनट में हम नाहरगढ़ फोर्ट पहुंच चुके थे। अरावली की पहाड़ियों पर स्थित इस फोर्ट का निर्माण कार्य 1734-1868 तक चला। कहा जाता है वहां के मरहूम राजकुमार नाहर सिंह की आत्मा वहां भटकती थी और किले की किसी भी निर्माण कार्य को रातो रात खंडहर में तब्दील कर देती थी। बहुत प्रार्थना करने के बाद वह एक शर्त पर फोर्ट को छोड़ने को राजी हुई कि इस फोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा जाए। इसलिए इस फोर्ट का नाम नहरगढ़ फोर्ट रखा गया। अगर आपको वाइल्ड लाइफ और ठंडी बीयर का शौक है तो आपको यहां जरूर आना चाहिए। यहां देखने के लिए शीश महल, सीढ़ीदार बाउली, वैक्स म्यूजियम, ओपन थिएटर और कुछ मॉडर्न आर्ट से सम्बंधित संकलन भी है। किले की चारदीवारी बहुत विस्तृत है। जिसके बीच बीच में मीनारें है जिनपर खड़े होकर आप अरावली की पहाड़ियों, घाटियों, और जयपुर शहर को देख सकते हैं। किले की छत से और मीनारों से जब आप नीचे देखते हैं तो घाटी बेहद खूबसूरत दिखती है। शाम के वक़्त हल्की धुंध के के बीच एक दूसरे को ढकती हुई,और एक दूसरे के पीछे से उचक उचक के देखती हुई पहाड़ियां आपको अपने साथ बांध लेंगी।

एक एडवाइस जरूर रहेगी की आपको इसे पूरी तरह घूमने के लिए बहुत सारी स्टेमिना की जरूरत होगी जिसके लिए खाने पीने के लिए यहां से लगभग एक किलोमीटर दायरे में बेहतरीन रेस्त्रां भी है जैसे पड़ाव और वंस अपॉन ए टाइम एट नाहरगढ़ है, जो थोडे महंगे है। उसके अलावा किले के बाहर लोकल्स के ठेले भी हैं जहां से आप चिप्स, पापड़, फल, पकोड़े, चाय आदि ले सकते हैं। मेरी पर्सनल पसंदीदा जगहों में से मुख्य थी वह बाऊली। एक अजीब सा आकर्षण है उसमे। वर्षा के जल को संग्रह करने के लिए बनाया गया वह कुआं भी सोचने को मजबूत कर रहा था कि हमारे पूर्वज भी जल संग्रह के प्रति जागरूक थे,पर हम सब जानते हुए भी पानी वेश्ट करते हैं। मॉडर्न आर्ट सम्बंधित कुछ चीजे भी बहुत उम्दा थी। जिनमें मार्क प्राइम की कृति क्रोमेटोफोबिया है,जो लकड़ी से बनी कृति है जिसमें विश्व के लगभग 160 देशों के सिक्के धंसे हुए हैं। एक दूसरी कृति जो विज्ञान का उम्दा प्रदर्शन है,जो है एल एन तल्लूर की कृति ट्राजिएंस । यहां आप पत्थरों से बनी नदी का प्रारूप भी देख सकते हैं।
हम थकान की हद तक किले को घूम चुके थे। पहाड़ों, घाटियों और शहर को निहार चुके थे। अब समय था वापस लौटने का।इसी बीच ऑटो अंकल आ पहुंचे थे हमें वापस लेने। उनके साथ लौटते हुए हम नटवर जी के मंदिर गए दर्शन के लिए,जिसका कपाट शाम के वक़्त बंद था इसलिए हम बाहर से ही प्रणाम करके पास में ही मौजूद कनक वृंदावन पार्क देखने चले गए। जो कि बहुत खूबसूरत था। हम चकित रह गए जब ड्राइवर अंकल ने बिना बताए ऑटो को मार्केट की तरफ ले लिया। हमने सख्ती से उनसे कहा कि बिना बोले वो अपनी मर्जी से हमे कहीं भी क्यों लेकर जा रहे तब उन्होंने ऑटो को यू टर्न लिया। रास्ते में ही हवा महल भी है जिसे दूर से ही देखते हुए हम वापस अपने होटल आ गए।

यहां की सबसे अच्छी बात ये है कि आपको होटल शहर के अंदर ही मिल जाएंगे और जरूरत के सारे सामान भी आस पास ही उपलब्ध हैं।

ये रहा हमारा पहला रोमांचक दिन जयपुर में, केवल नाहरगढ किले के नाम।

What the truth is?

You are just a passing flame

That’s what i thought when we first met

I thought you will walk away

So I can’t let myself feel that way

I told myself not to care

I told myself not to share

But that’s all just insane

God had a different plan.

My truth is

I love you

And I surrendered myself to you

So if you love me too

I need to know from you

What your truth is.

Given words to my feelings

Hidden for so long, couldn’t anymore

This secret hurts,couldn’t deal with

Keeping it inside,brought me tortured nights

But now i have uttered my feelings

Now no sorry no regrets.

I am trying reading your eyes

Trying reading your mind

Trying getting meanings from your words

But scared

What if my heart makes me feel

What I want to feel

Don’t want to make fool out of me

So I am leaving it to you and

Wish to know from you

What your truth is.

I Am not asking for more,is it?

I don’t know the love vibes
But when you are with me I feel comfortable,

And when you embrace me, I forget all my pains
It’s the best feeling ever
Gives me calm and peace

I wish I could be same for you too

You could feel same with me

I could be your resting wings

Where you could feel comfort and peace.

I don’t want to know the intricacies of love.

I just want to see you happy.

I don’t know how to express my love.
I just don’t want you to get wet in the rain,
When we share same umbrella.

I just don’t want you to walk on the right

When we walk on a paced road.

I don’t know how to express my Love.

Your smile can put moon to shame,

You have that bright aura.
Your eyes can shoot my heart

Without causing a single harm to my skin

Your arms can make me feel warm in chilled

Without any fire,just with embrace

Baby you just lack those wings

But nobody can deny
If I say, ‘you are an angel’.

I am not asking anything more, is it?

If I say

I want to watch you close eyes besides me

For it’s good to see you fall asleep

I want to see you smile

Unknowingly in your sleep

I wonder if you are dreaming me

Only this thought gives butterflies in veins.

If your Love is a dream then I wish it to be true

Cause I am madly in love with you

Just want to stay together with you
Until my last breath.

Baby I am not asking more,is it?